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	<title>सेहत &#8211; Ameer Bharat | अमीर भारत</title>
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	<description>Hindi News, Lifestyle &#38; Entertainment News</description>
	<lastBuildDate>Fri, 15 May 2026 06:32:06 +0000</lastBuildDate>
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		<title>रोजाना कॉफी पीने वालों में कम रहता है डिमेंशिया का खतरा</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160475/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 May 2026 06:32:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[हम में से बहुत से लोगों के दिन की शुरुआत एक गरमा-गरम एस्प्रेसो या कैपेचीनो से होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यह रोजाना की आदत आपको एक बहुत बड़ी बीमारी से बचा सकती है? जी हां, हाल ही में सामने आए एक अध्ययन से यह पता चला है कि रोजाना दो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="776" height="386" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14.jpg 776w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14-768x382.jpg 768w" sizes="(max-width: 776px) 100vw, 776px"></p>
<p>हम में से बहुत से लोगों के दिन की शुरुआत एक गरमा-गरम एस्प्रेसो या कैपेचीनो से होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यह रोजाना की आदत आपको एक बहुत बड़ी बीमारी से बचा सकती है?</p>
<p>जी हां, हाल ही में सामने आए एक अध्ययन से यह पता चला है कि रोजाना दो से तीन कप कॉफी पीने से उम्र बढ़ने के साथ डिमेंशिया का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।</p>
<p><strong>कैसे काम करती है कॉफी?<br /></strong>शोधकर्ताओं के अनुसार, कॉफी में मौजूद कैफीन हमारे दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय रखने में बेहद मददगार है। इतना ही नहीं, यह अल्जाइमर से जुड़ी सूजन और दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्लाक को भी कम करने में सहायता करता है। इसका मतलब यह है कि रोजाना कॉफी पीने की आदत आपको सिर्फ ताजगी और ऊर्जा ही नहीं देती, बल्कि आपके दिमाग की रक्षा भी करती है।</p>
<p><strong>क्या कहता है 43 साल लंबा अध्ययन?<br /></strong>इस बात को साबित करने के लिए अमेरिका में एक बहुत बड़ा शोध किया गया। इस शोध में 1,31,821 नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों को शामिल किया गया। इन सभी लोगों पर पूरे 43 सालों तक नजर रखी गई। जब यह अध्ययन शुरू हुआ, तब प्रतिभागियों की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी। अध्ययन के दौरान लगभग 11,033 लोगों (यानी कुल लोगों का 8 प्रतिशत) में डिमेंशिया की समस्या देखी गई।</p>
<p>हालांकि, शोधकर्ताओं ने एक बहुत ही दिलचस्प बात नोटिस की। जो लोग नियमित रूप से कैफीनयुक्त कॉफी या चाय का सेवन करते थे, उनमें डिमेंशिया विकसित होने की संभावना काफी कम थी। इस आदत का सबसे अधिक फायदा 75 वर्ष और उससे कम आयु के वयस्कों में देखा गया।</p>
<p><strong>हर चीज की बुरी है अति<br /></strong>विज्ञानियों ने इसके फायदों के साथ-साथ एक जरूरी सलाह भी दी है। उनका कहना है कि मध्यम मात्रा में कॉफी या चाय पीना ही फायदेमंद है। अगर आप यह सोचकर बहुत ज्यादा कॉफी पीने लगेंगे कि इससे ज्यादा फायदा होगा, तो यह गलत है। हद से ज्यादा कॉफी पीने से इसका यह सुरक्षात्मक प्रभाव कम होने लगता है।</p>
</div>
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		<title>पानी की कमी से गर्मियों में बढ़ सकती है पेट की गर्मी और गैस!</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160433/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 May 2026 06:31:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[अगर पेट में लगातार दर्द बना रहता है तो इसे अनदेखा न करें। जल्द से जल्द किसी कुशल चिकित्सक से आपको संपर्क करना चाहिए। गर्मी के दिनों में उच्च तापमान और शरीर में पानी की कमी अर्थात डिहाइड्रेशन के कारण पेट संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। यही नहीं इन दिनों शरीर से पसीने के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="780" height="408" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6.jpg 780w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6-768x402.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px"></p>
<p>अगर पेट में लगातार दर्द बना रहता है तो इसे अनदेखा न करें। जल्द से जल्द किसी कुशल चिकित्सक से आपको संपर्क करना चाहिए। गर्मी के दिनों में उच्च तापमान और शरीर में पानी की कमी अर्थात डिहाइड्रेशन के कारण पेट संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। यही नहीं इन दिनों शरीर से पसीने के रूप में भी काफी मात्रा में पानी निकल जाता है।</p>
<p>पानी की कमी होने पर पेट के अंदर बैड बैक्टीरिया को पनपने के लिए अनुकूल माहौल मिल जाता है। इस कारण पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं। शरीर में पानी की कमी के कारण पेट में एसिड की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है। इससे पेट और सीने में जलन होने लगती है। पानी की कमी होने पर कब्ज की समस्या भी बढ़ जाती है। इसके साथ ही ब्लोटिंग अर्थात पेट फूलने और पेट में गैस बनने की समस्या भी सामने आती है।</p>
<h3 class="wp-block-heading">खानपान में सतर्कता है जरूरी</h3>
<p>गर्मी के दिनों ज्यादा फैट वाले भोजन का प्रयोग करना भी हानिकारक साबित हो सकता है। ज्यादा फैट युक्त भोजन का सेवन करने से अपच संबंधी समस्या सामने आ सकती हैं। इससे पेट में जलन की समस्या भी बढ़ सकती है। गर्मी के दिनों में बहुत से लोग आइसक्रीम और अन्य ठंडे पेय पदार्थों का यह सोचकर सेवन बढ़ा देते हैं कि ये तो ठंडे पदार्थ हैं, लेकिन ठंडे तापमान और शक्कर की अधिक मात्रा का संयोजन पेट संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है। यही नहीं जो लोग लैक्टोज या डेयरी उत्पादों के प्रति संवेदनशील हैं, उनके लिए भी ये खाद्य पदार्थ पेट में गैस, ऐंठन और दस्त का कारण बन सकते हैं।</p>
<p><strong>पेट संबंधी समस्याओं से ऐसे होगा बचाव<br /></strong>अगर आपको किडनी संबंधी और पेट संबंधी अन्य कोई समस्या नहीं है तो गर्मी के दिनों में दिनभर में कम से कम ढाई से तीन लीटर पानी अवश्य पिएं।<br />इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करने के लिए नींबू की शिकंजी, नारियल पानी या ओआरएस का घोल लें। नारियल पानी पेट के पीएच स्तर को संतुलित रखने में मदद करता है।<br />ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों का भरपूर सेवन करें, जैसे दही, छाछ, रायता, लस्सी। इनसे पेट की गर्मी शांत होती है और पाचनतंत्र सही रहता है।<br />पेट और पाचनतंत्र को सही रखने के लिए मौसमी फलों का सेवन अवश्य करें, जैसे तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी आदि। इनमें पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होने पाती है।<br />गर्मी के दिनों में बाहर का खाना खासकर स्ट्रीट फूड खाने से अवश्य बचें।<br />बाहर के खाने के बजाय घर का बना ताजा खाना खाएं। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि खाना हल्का अर्थात जल्दी पचने वाला हो, उसमें तेल-मसाले का प्रयोग कम किया गया हो।</p>
<p><strong>बनाएं दूरी<br /></strong>बहुत अधिक मात्रा में चाय या काफी का सेवन न करें।<br />विभिन्न प्रकार के कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन कम से कम करें।<br />डिब्बाबंद और प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें।<br />अधिक तैलीय भोजन का सेवन न करें।</p>
<p><strong>पेट की गर्मी बढ़ने के कारण<br /></strong>मसालेदार और अधिक तैलीय भोजन का सेवन, इससे पेट में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है।<br />खानपान में अनियमितता, समय से भोजन न करना, अधिक मात्रा में खा लेना, भोजन का बिल्कुल सेवन न करना, देर रात भोजन करना, इससे पाचनतंत्र प्रभावित होता है।<br />शरीर में पानी की कमी, कम मात्रा में पानी पीने से पाचनक्रिया खराब होती है और एसिडिटी की मात्रा भी बढ़ जाती है।<br />शरीर में अधिक कैफीन का पहुंचना, इससे पेट की अंदरूनी परत में जलन होने लगती है।<br />तनाव और चिंता, इनसे भी शरीर में एसिड का उत्पादन अधिक मात्रा में होने लगता है। इससे पेट की गर्मी बढ़ जाती है।<br />नींद की कमी, अपर्याप्त नींद न केवल पाचनक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि पेट के अंदर की गर्मी को भी बढ़ा देती है।</p>
<p><strong>डॉक्टर से मिलें, अगर<br /></strong>अगर घरेलू उपायों से पेट संबंधी समस्याओं में आराम न मिले।<br />पेट में जलन लगातार बनी रहे और दर्द भी हो।<br />बार-बार उल्टी या दस्त हों।<br />वजन में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा हो।</p>
<p><strong>घरेलू उपाय हैं बहुत लाभकारी<br /></strong>वैद्य अच्युत कुमार त्रिपाठी (सदस्य एवं गुरु राष्ट्रीय आर्युवेद विद्यापीठ) के मुताबिक इस मौसम में जिस प्रकार से प्रकृति में जलीय तत्वों की कमी हो जाती है, ठीक उसी प्रकार से शरीर में। गर्मी में वात, पित्त में असंतुलन हो जाने के कारण उदर संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए जरूरी है कि हम कुछ घरेलू उपायों पर अमल करें।</p>
<p>इसके लिए रात में थोड़ी सूखी धनिया, कच्चा जीरा और सौंफ को रात में भिगो दें। सुबह इन तीनों को पीस लें। इस मिश्रण से एक चम्मच मात्रा लेकर एक गिलास पानी में मिलाकर पिएं। आप इसमें ग्लूकोज भी मिला सकते हैं।<br />इस मिश्रण को फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं। कच्ची या भुनी हुई सौंफ में थोड़ी सी मिश्री मिलाकर खाने से भी आराम मिलता है।<br />इसी तरह छाछ के साथ सेंधा नमक, भुना पिसा जीरा मिलाकर पीने से भी राहत मिलती है। इनसे भूख भी बढ़ती है।<br />इस मौसम में बेल का मुरब्बा और बेल का शर्बत पीने से भी काफी आराम मिलता है। बेल का पाउडर भी खाया जा सकता है।<br />आजवाइन, जीरा, कलौंजी और एक या दो ग्राम हींग, छोटी हर्र देसी घी में पकाकर पीस लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिला सकते हैं। खाना खाने के बाद इसे खा सकते हैं।<br />रात में बीज निकालकर मुनक्का को पानी में भिगो दें, सुबह इसे खा सकते हैं। रात में त्रिफला चूर्ण भी खा सकते हैं। इसे पानी या दूध किसी के साथ ले सकते हैं।<br />25 दाने किशमिश, दो अंजीर, पांच टुकड़े अखरोट, पांच बादाम रात में भिगो दें और सुबह नाश्ते पहले इन्हें अच्छी तरह चबाकर खाएं। इसके साथ एक कप दूध ले लें। इससे उदर रोगों के साथ ही कोलेस्ट्राल और ब्लड प्रेशर संबंधी समस्याओं से भी राहत मिलती है साथ ही शरीर को पोषण।<br />इन्हें स्टील, कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में ही भिगोएं। इसके साथ ही तरबूज और खरबूजा का सेवन अवश्य करें। बस, इन्हें खाने के बाद थोड़ी देर तक पानी बिल्कुल न पिएं।<br />आम का पना, गन्ने का रस भी बहुत लाभदायक होता है। हर मौसम में पाए जाने वाले फल, उस ऋतु में होने वाली समस्याओं से राहत दिलाते हैं।</p>
</div>
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		<title>आंखों में बार-बार खुजली और चुभन को न समझें नॉर्मल थकान</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160417/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 May 2026 06:32:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[आज की डिजिटल लाइफस्टाइल और बढ़ते प्रदूषण के बीच आंखों में जलन, खुजली और पानी आने की समस्या एक आम बात हो गई है। स्क्रीन के इस्तेमाल के बाद हल्की जलन कभी-कभी नॉर्मल लग सकती है, लेकिन अगर आपकी आंखों में बार-बार रेडनेस, ड्राईनेस या ऐसा महसूस होता है जैसे आंखों में कुछ चला गया &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="754" height="390" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/4-12.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>आज की डिजिटल लाइफस्टाइल और बढ़ते प्रदूषण के बीच आंखों में जलन, खुजली और पानी आने की समस्या एक आम बात हो गई है। स्क्रीन के इस्तेमाल के बाद हल्की जलन कभी-कभी नॉर्मल लग सकती है, लेकिन अगर आपकी आंखों में बार-बार रेडनेस, ड्राईनेस या ऐसा महसूस होता है जैसे आंखों में कुछ चला गया है, तो यह गंभीर समस्या हो सकती है।</p>
<p>आइए डॉ. रश्मि मित्तल (सीनियर कंसल्टेंट, ऑप्थैलमोलॉजी, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानें कि आंखों में इरिटेशन के पीछे क्या कारण जिम्मेदार हैं।</p>
<p><strong>आंसू की परत पतली होना<br /></strong>हमारी आंखों की सतह पानी, ऑयल और म्यूकस की एक पतली परत से सुरक्षित रहती है, जिसे टियर फिल्म कहा जाता है। यह परत आंखों को नम रखने और बाहरी इन्फेक्शन से बचाने का काम करती है। जब यह सुरक्षात्मक परत अस्थिर हो जाती है, तो आंखें सीधे हवा के कॉन्टेक्ट में आती हैं, जिससे ड्राईनेस और जलन शुरू हो जाती है।</p>
<p><strong>डिजिटल आई स्ट्रेन और पलकें झपकाने में कमी<br /></strong>आजकल आंखों की जलन का सबसे बड़ा कारण कंप्यूटर विजन सिंड्रोम है। जब हम लंबे समय तक स्क्रीन को देखते हैं, तो हमारी पलकें झपकाने की दर 50-60% तक कम हो जाती है। कम पलकें झपकाने से आंसू जल्दी सूख जाते हैं, जिससे आंखों में ड्राईनेस और चुभन महसूस होने लगती है।</p>
<p>इसके कारण मीबोमियन ग्लैंड डिसफंक्शन की समस्या भी हो सकती है। इसमें पलकों क ऑयल ग्लैंड्स भी ठीक से काम करना बंद कर देते हैं।</p>
<p><strong>प्रदूषण और पर्यावरण से जुड़े कारण<br /></strong>भारत के शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। हवा में मौजूद प्रदूषण, धुआं और केमिकल सीधे हमारी आंखों की पुतली को प्रभावित करते हैं। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से आंखों की सतह पर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा होती है।</p>
<p><strong>एलर्जी और बीमारियां<br /></strong>धूल, पोलन, पालतू जानवरों के बाल या मोल्ड अक्सर एलर्जी का कारण बनते हैं। इसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस कहा जाता है, जिसमें शरीर हिस्टामाइन रिलीज करता है, जिससे आंखों में तेज खुजली, सूजन और पानी आने लगता है। इसके अलावा, विटामिन-ए की कमी, डायबिटीज, साइनस एलर्जी और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर भी आंखों की जलन के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।</p>
<p><strong>बचाव के उपाय<br /></strong>ज्यादातर लोग राहत के लिए बिना डॉक्टरी सलाह के आई-ड्रॉप्स का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। स्टेरॉयड-बेस्ड आई-ड्रॉप्स डॉक्टर की सलाह के बिना इस्तेमाल करना मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी खतरनाक स्थितियों को जन्म दे सकता है।</p>
<p><strong>स्वस्थ आंखों के लिए कुछ जरूरी टिप्स<br /></strong>20-20-20 नियम- हर 20 मिनट के स्क्रीन समय के बाद, 20 फीट दूर रखी किसी चीज को 20 सेकंड के लिए देखें।<br />हाइड्रेशन और नींद- शरीर में पानी की कमी न होने दें और पूरी नींद लें।<br />पलकें झपकाएं- काम के दौरान जानबूझकर पलकें झपकाने की कोशिश करें।<br />डॉक्टरी सलाह- अगर जलन हफ्तों तक बनी रहे या आंखों में दर्द हो, तो घरेलू इलाज के बजाय किसी आई स्पेशेलिस्ट से पूरी जांच कराएं।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>90% महिलाएं ही क्यों होती हैं Lupus का शिकार? </title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160383/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 May 2026 06:32:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[जरा सोचिए, जो इम्यून सिस्टम शरीर की ढाल होता है, वही अगर शरीर का दुश्मन बन जाए तो क्या होगा? ल्यूपस ठीक ऐसी ही एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है। यह जोड़ों, त्वचा, किडनी और फेफड़ों समेत शरीर के कई अहम अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="676" height="336" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/12.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy"></p>
<p>जरा सोचिए, जो इम्यून सिस्टम शरीर की ढाल होता है, वही अगर शरीर का दुश्मन बन जाए तो क्या होगा? ल्यूपस ठीक ऐसी ही एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है। यह जोड़ों, त्वचा, किडनी और फेफड़ों समेत शरीर के कई अहम अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को कहीं ज्यादा निशाना बनाती है। </p>
<p>दुनियाभर में ल्यूपस के कुल मामलों में से 90% केवल महिलाओं, खासकर 15 से 44 वर्ष की आयु, में देखे जाते हैं। आखिर महिलाओं में ही इस बीमारी का जोखिम इतना ज्यादा क्यों है? आइए इसके पीछे छिपे कारणों को समझते हैं।</p>
<p><strong>लक्षणों को पहचानना क्यों है मुश्किल?<br /></strong>ल्यूपस की शुरुआती पहचान मुश्किल होती है क्योंकि इसके लक्षण बहुत सामान्य होते हैं। बहुत थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार, बालों का झड़ना, रेशैज और याददाश्त में कमी जैसे लक्षण कई अन्य कारणों से हो सकते हैं। इसलिए अगर इनमें से कई लक्षण बार-बार उभर रहे हों, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p><strong>हार्मोन्स का प्रभाव<br /></strong>महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है, खासतौर से उनकी रिप्रोडक्टिव एज (15-44 वर्ष) के दौरान। इसी समय में ल्यूपस के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं। पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इम्यून सिस्टम की एक्टिविटी को प्रभावित कर सकते हैं, जो महिलाओं में ल्यूपस के लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं कि एस्ट्रोजन हार्मोन ल्यूपस का सीधा कारण है।</p>
<p><strong>जेनेटिक्स और X क्रोमोसोम<br /></strong>महिलाओं में दो X क्रोमोसोम होते हैं, जबकि पुरुषों में एक X और एक Y क्रोमोसोम होता है। इम्यून सिस्टम से जुड़े कई अहम जीन X क्रोमोसोम पर स्थित होते हैं। महिलाओं के इम्यून सिस्टम में इन जीनों की एक्टिविटी उन्हें इन्फेक्शन के खिलाफ ज्यादा सुरक्षा देती है, लेकिन यही शरीर के खिलाफ काम करने का जोखिम भी बढ़ा देती है। आसान शब्दों में कहें तो, महिलाओं का इम्यून सिस्टम पुरुषों की तुलना में ज्यादा रिएक्टिव होता है।</p>
<p><strong>पर्यावरण से जुड़े ट्रिगर्स<br /></strong>केवल जेनेटिक्स ही ल्यूपस का कारण नहीं बनते, लेकिन ये रिस्क जरूर बढ़ा देते हैं। इसके साथ मिलकर पर्यावरण से जुड़े कुछ फैक्टर्स, जैसे- सूरज की रोशनी, स्ट्रेस, वायरल इन्फेक्शन, स्मोकिंग, प्रदूषण और केमिकल्स ल्यूपस को ट्रिगर कर सकते हैं।</p>
<p><strong>किन महिलाओं में है ज्यादा खतरा?<br /></strong>ल्यूपस सभी महिलाओं को समान रूप से प्रभावित नहीं करता है। शोध बताते हैं कि ब्लैक, हिस्पैनिक, एशियाई और इंडिजीनस महिलाओं में इस बीमारी का खतरा ज्यादा होता है। ब्लैक महिलाओं में ल्यूपस विकसित होने का खतरा व्हाइट महिलाओं की तुलना में तीन गुना ज्यादा होता है। इसके पीछे जेनेटिक कारणों के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में कमी, देरी से पता चलना और सामाजिक-आर्थिक कारक भी जिम्मेदार हो सकते हैं।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सिर्फ पेट नहीं भरेगा, आपकी गट हेल्थ भी सुधारेगा आपका ब्रेकफास्ट</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160385/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 May 2026 06:32:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[अक्सर हम ब्रेकफास्ट को नजरअंदाज कर देते हैं या फिर जल्दबाजी में कुछ भी अनहेल्दी खा लेते हैं, लेकिन सुबह का नाश्ता आपके पूरे दिन की एनर्जी और मेटाबॉलिज्म के लिए बेहद जरूरी है। इसलिए सुबह हेल्दी ब्रेकफास्ट करना बेहद जरूरी है। जाने-माने गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी के अनुसार, अगर आप अपने सुबह के नाश्ते &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="734" height="374" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/2-7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>अक्सर हम ब्रेकफास्ट को नजरअंदाज कर देते हैं या फिर जल्दबाजी में कुछ भी अनहेल्दी खा लेते हैं, लेकिन सुबह का नाश्ता आपके पूरे दिन की एनर्जी और मेटाबॉलिज्म के लिए बेहद जरूरी है। इसलिए सुबह हेल्दी ब्रेकफास्ट करना बेहद जरूरी है।</p>
<p>जाने-माने गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी के अनुसार, अगर आप अपने सुबह के नाश्ते में 3 खास चीजों को शामिल कर लें, तो यह न सिर्फ आपकी गट हेल्थ को दुरुस्त रखेगा, बल्कि आपकी पूरी सेहत को बूस्ट देगा। आइए जानते हैं इन 3 सुपरफूड्स के बारे में।</p>
<p><strong>उबले हुए अंडे- प्रोटीन का पावरहाउस<br /></strong>अंडे को नेचर का मल्टीविटामिन कहा जाता है। सुबह के समय उबले हुए अंडे खाना सबसे बेहतरीन नाश्ता हो सकता है।</p>
<p>प्रोटीन से भरपूर- एक उबले हुए अंडे में हाई प्रोटीन होता है, जो मांसपेशियों की मरम्मत और विकास में मदद करता है।<br />गट लाइनिंग को सपोर्ट- अंडे में मौजूद अमीनो एसिड्स आपकी आंतों की परत को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।<br />लंबे समय तक पेट भरा- अंडे खाने से पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आप दोपहर के खाने तक अनहेल्दी स्नैकिंग से बच जाते हैं।</p>
<p><strong>चिया सीड्स- फाइबर और शुगर कंट्रोल का राज<br /></strong>चिया सीड्स छोटे काले और सफेद बीज होते हैं, जो पोषक तत्वों का खजाना हैं। इन्हें खाने का सबसे सही तरीका इन्हें रात भर पानी में भिगोकर रखना है और सुबह ब्रेकफास्ट में शामिल करना।</p>
<p>सॉल्यूबल फाइबर- भिगोने पर चिया सीड्स एक जेल जैसा पदार्थ बनाते हैं। यह सॉल्यूबल फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है और कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करता है।<br />गुड बैक्टीरिया का दोस्त- यह फाइबर आपकी आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के लिए खाने का काम करता है।<br />ब्लड शुगर बैलेंस- चिया सीड्स खाने के बाद शरीर में कार्बोहाइड्रेट के अब्जॉर्प्शन की गति को धीमा कर देते हैं, जिससे ब्लड शुगर अचानक से नहीं बढ़ता।</p>
<p><strong>ग्रीक योगर्ट- प्रोबायोटिक्स का खजाना<br /></strong>साधारण दही के मुकाबले ग्रीक योगर्ट में ज्यादा प्रोटीन और गाढ़ापन होता है, लेकिन इसे चुनते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। डॉक्टर हमेशा प्लेन यानी बिना चीनी वाला और फुल-फैट विथ लाइव कल्चर वाला योगर्ट चुनने की सलाह देते हैं। लो-फैट या फ्लेवर्ड योगर्ट में अक्सर एक्स्ट्रा चीनी और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं जो फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकते हैं।</p>
<p>प्रोबायोटिक्स- इसमें मौजूद लाइव और एक्टिव कल्चर आपकी आंतों के माइक्रोबायोम को संतुलित रखते हैं, जिससे इम्युनिटी बढ़ती है।<br />हड्डियों की मजबूती- कैल्शियम और विटामिन-बी12 से भरपूर होने के कारण यह हड्डियों और दिमाग के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>सेहत में जादुई सुधार कर सकता है सिर्फ एक घंटे का ‘डिजिटल डिटॉक्स’</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160373/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 10 May 2026 12:32:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[फोन या स्क्रीन देखने के दूसरे तरीके हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन गए हैं। इनके बिना जीवन चल पाएगी ये सोचा भी नहीं जा सकता। ब्लू लाइट के रेडिएशन से हमारी मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। कई रिसर्च और रिपोर्ट में सामने आ चुका है कि हमें इस स्क्रीन टाइम को घटाना &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="778" height="379" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/3-9.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/3-9.jpg 778w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/3-9-768x374.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 778px) 100vw, 778px"></p>
<p>फोन या स्क्रीन देखने के दूसरे तरीके हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन गए हैं। इनके बिना जीवन चल पाएगी ये सोचा भी नहीं जा सकता। ब्लू लाइट के रेडिएशन से हमारी मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। कई रिसर्च और रिपोर्ट में सामने आ चुका है कि हमें इस स्क्रीन टाइम को घटाना चाहिए। इसके लिए डिजिटल डिटाक्स के तरीके को फालो करना बेहतर है। इसमें आपको कुछ देर के लिए मोबाइल, लैपटाप या दूसरे गैजेट्स से दूरी बनानी होती है।</p>
<p>हम सिर्फ एक घंटे के डिजिटल डिटाक्स की बात कर रहे हैं। सिर्फ आपको एक घंटे के लिए फोन से दूरी बनाकर रखनी होती है। यह मानसिक तनाव, अवसाद और नींद की कमी को कम करता है। इसके साथ ही यह वास्तविक जीवन, शौक और अपनों के साथ समय बिताने का एक तरीका है। यह एकाग्रता बढ़ाता है और स्क्रीन-आधारित व्यसन से मुक्ति दिलाता है। जब दिमाग खाली होता है तो नए विचार और रचनात्मकता पनपते है, जो लगातार मनोरंजन से दब जाते हैं। हमारे ज्यादातर काम फोन से ही होते हैं और इस पर लंबे समय तक रील्स देखने की आदत भी लोगों को पड़ चुकी है। धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ जाती है और हम बिना किसी कारण के भी फोन देखते रहते हैं।</p>
<p><strong>सोशल मीडिया की लत से चाहिए आजादी?<br /></strong>कम समय के लिए आप किस तरह डिजिटल डिटाक्स को फालो कर सकते हैं। मोबाइल की लत लोगों को इस कदर है कि वो रात को देर तक सिर्फ रील्स देखते रहते हैं। शार्ट वीडियो के अलावा टीवी स्क्रीन पर घंटों बिताना भी इसमें शामिल है। इसके अलावा रोजमर्रा के ज्यादातर काम भी फोन से ही होते हैं। इसे पूरी तरह छोड़ पाना संभव नहीं है, लेकिन इस आदत को कंट्रोल करना डिजिटल डिटाक्स कहलाता है। अगर कुछ देर के लिए भी डिजिटल डिटाक्स को फालो करते हैं तो इससे भी दिमाग की कार्यक्षमता बेहतर होती है।</p>
<p><strong>डिजिटल डिटाक्स के फायदे<br /></strong>अगर आप सिर्फ एक घंटे के लिए भी फोन या हमारे ज्यादातर काम फोन से ही होते दूसरी स्क्रीन से दूरी बनाते हैं तो इससे हमारी नींद में सुधार आता है । दिमाग के थक जाने के बावजूद फोन पर समय बिताने से मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ती है। रात में देर तक फोन देखने की आदत लगातार बनी रहे तो स्लीपिंग पैटर्न खराब होता है, इसलिए दिन में एक बार डिजिटल डिटाक्स पर फोकस जरूर करना है।</p>
<p>इससे दिमाग के स्वास्थ्य में भी सुधार आता है क्योंकि फोन की लत हमारे फोकस को बिगाड़ती है। जब हम गैजेट्स से दूर रहते हैं तो दिमाग को आराम मिलता है। इसके अलावा दिमाग में नई कोशिकाएं भी बनती हैं जिससे फोकस बढ़ता है और दूसरे फायदे भी होते हैं।</p>
<p>यह रूटीन काम में गुणवत्ता को बढ़ाता है। दरअसल, चीजों में ध्यान न लगाने की वजह से काम में उत्पादन बिगड़ता है, इसलिए रोजाना कम से कम एक घंटे के लिए डिजिटल डिटाक्स को फालो करना चाहिए।</p>
<p><strong>कैसे करें इसकी शुरुआत?<br /></strong>ज्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं होता है कि हमें डिजिटल डिटॉक्स को फालो कैसे करना है, इसलिए आपको इसकी शुरुआत सिर्फ एक घंटे के लिए करनी चाहिए।<br />इसकी शुरुआत आप रविवार या अपने वीकआफ से कर सकते हैं। धीरे- धीरे आदत बन जाए तो हफ्ते में 3 दिन एक घंटे के डिजिटल डिटाक्स को फालो करें।<br />फोन के नोटिफिकेशन्स को इस दौरान पूरी तरह से बंद कर दें। हो सके तो इंटरनेट की सर्विस ही रोक दें। इस दौरान पर जरूरी काल और मैसेज ही चालू रखें।<br />फोन की स्क्रीन को कलरफुल रखने की जगह डार्क मोड में रखें। ज्यादा लाइट से आंखों पर बुरा असर पड़ता है।</p>
</div>
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		<item>
		<title>बीमारी ठीक होगी या और बिगड़ेगी? अब एक ‘ब्लड टेस्ट’ से ही लगा सकेंगे पता</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160339/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 09 May 2026 06:31:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[एक ब्लड टेस्ट यह भविष्यवाणी करने में मदद कर सकता है कि किसी व्यक्ति की बीमारी की प्रगति कैसे होगी और वे उपचार के प्रति कितनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया देंगे। एक अध्ययन के अनुसार यह जानकारी सामने आई है। लंदन के इम्पीरियल कालेज के विज्ञानियों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने कहा, वेलोसीडी नामक इस परीक्षण &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="741" height="394" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/1-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>एक ब्लड टेस्ट यह भविष्यवाणी करने में मदद कर सकता है कि किसी व्यक्ति की बीमारी की प्रगति कैसे होगी और वे उपचार के प्रति कितनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया देंगे। एक अध्ययन के अनुसार यह जानकारी सामने आई है।</p>
<p>लंदन के इम्पीरियल कालेज के विज्ञानियों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने कहा, वेलोसीडी नामक इस परीक्षण विधि से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि तीव्र बुखार से ग्रस्त बच्चों के ठीक होने की संभावना है या उनकी स्थिति बिगड़ने की और क्या स्वस्थ वयस्कों में वायरस के संपर्क में आने के बाद फ्लू या कोविड- 1 -19 विकसित होने की संभावना है।</p>
<p>यह परीक्षण एक प्रमाण आधारित अध्ययन में वर्णित किया गया है और इसे जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है। यह ब्लड में प्रमुख मार्करों को मापता है, जो बीमारी के प्रति जीन अभिव्यक्ति के स्तर को प्रकट करता है, ताकि बीमारी की संभावित प्रगति का अनुमान लगाया जा सके। नियमित ब्लड टेस्ट (जैसे एचबीए1सी, लिपिड प्रोफाइल) डायबिटीज और हृदय रोगों के प्रबंधन में मदद करते हैं।</p>
<h2 class="wp-block-heading">बीमारी के कारणों की पहचान करने में करेगी मदद</h2>
<p>लंदन के इम्पीरियल कालेज में संक्रामक रोगों के विभाग के प्रमुख और वरिष्ठ लेखक आब्रे कन्निंगटन ने कहा, हम मानते हैं कि इस प्रकार का परीक्षण मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए अत्यधिक लाभकारी हो सकता है। चिकित्सकों को एक ऐसा परीक्षण प्रदान करके जो बीमारी के पाठ्यक्रम की भविष्यवाणी कर सकता है, यह सही उपचार को सही समय पर सही मरीज तक पहुंचाने में मरीजों को बहुत तेजी से प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है।</p>
<p>शोधकर्ताओं ने समझाया कि जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो जीनों के संयोजन ‘ऑन’ और ‘आफ’ होते हैं, जिससे आरएनए मार्कर पैदा होते हैं जिन्हें ब्लड में पहचाना जा सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि आरएनए मार्करों के पैटर्न किसी व्यक्ति की बीमारी के कारण की पहचान करने में मदद कर सकते हैं, जैसे कि बुखार बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के कारण है या नहीं।</p>
<h2 class="wp-block-heading">एकल कोशिकाओं का किया जा सकेगा अध्ययन</h2>
<p>टीम ने ‘आरएनए वेलासिटी’ नामक एक विधि का उपयोग किया, जिसे मूल रूप से एकल कोशिकाओं के अध्ययन के लिए विकसित किया गया था, लेकिन इसे संपूर्ण ब्लड सैंपल का परीक्षण करने के लिए अनुकूलित और संवर्धित किया गया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या मार्कर भविष्यवाणी भी कर सकते हैं, क्या एक मरीज बेहतर होने की संभावना है या बिगड़ने की और वे उपचार के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देंगे। इस विधि ने शोधकर्ताओं को यह देखने में मदद की कि कौन से जीन सक्रिय हो रहे हैं और क्या बिना समय के साथ बार-बार माप किए उनकी गतिविधि बढ़ रही है या घट रही है।</p>
<h2 class="wp-block-heading">भविष्य की क्लिनिकल स्थिति की मिलेगी जानकारी</h2>
<p>उदाहरण के लिए, टीम यह अनुमान लगा सकती थी कि किसी व्यक्ति के ब्लड में जीन अभिव्यक्ति के पैटर्न में परिवर्तन अधिक या कम गंभीर बीमारियों या हल्की, स्व-समाधान करने वाली बीमारियों के परिणामों के समान हो रहे हैं या नहीं। किसी व्यक्ति की भविष्य की क्लिनिकल स्थिति और उनकी बीमारी के पाठ्यक्रम के बारे में परिणाम की जानकारी प्रदान कर सकते हैं।</p>
<p>शोध लेखकों ने लिखा कि हमने वेलोसीडी विकसित किया, जो एकल समय बिंदु आरएनए नमूने से क्लिनिकल स्थिति में संक्रमणों की भविष्यवाणी के लिए एक विधि है । उन्होंने कहा कि यह इन्फ्लूएंजा ए और एसएआरएस-सीओवी-2 नियंत्रित मानव संक्रमण अध्ययनों में ट्रांसक्रिप्टोमिक प्रगति और भविष्य के संक्रमण की स्थिति की भविष्यवाणी करता है।</p>
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		<item>
		<title>प्यास बुझाने के साथ शरीर की गर्मी भी शांत करेगा खस का शरबत</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160309/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 May 2026 06:31:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[बाजार में मिलने वाले केमिकल बेस्ड कोल्ड ड्रिंक्स भले ही कुछ देर के लिए गर्मी से राहत दे दें, लेकिन ये हमारी सेहत को नुकसान ही पहुंचाते हैं। अगर आप इस भयंकर गर्मी में कुछ प्राकृतिक, स्वादिष्ट और सेहतमंद ढूंढ रहे हैं, तो ‘खस का शरबत’ आपके लिए एकदम सही ड्रिंक है। दरअसल, खस की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="763" height="372" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/6tuyg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>बाजार में मिलने वाले केमिकल बेस्ड कोल्ड ड्रिंक्स भले ही कुछ देर के लिए गर्मी से राहत दे दें, लेकिन ये हमारी सेहत को नुकसान ही पहुंचाते हैं। अगर आप इस भयंकर गर्मी में कुछ प्राकृतिक, स्वादिष्ट और सेहतमंद ढूंढ रहे हैं, तो ‘खस का शरबत’ आपके लिए एकदम सही ड्रिंक है।</p>
<p>दरअसल, खस की तासीर बेहद ठंडी मानी जाती है। इसका शरबत न सिर्फ आपकी तुरंत प्यास बुझाता है, बल्कि पेट और शरीर की अंदरूनी गर्मी को भी एकदम शांत कर देता है। आइए जानते हैं घर पर ही एकदम शुद्ध और बाजार से भी अच्छा खस का शरबत बनाने का सबसे आसान तरीका।</p>
<p><strong>खस का सिरप बनाने के लिए जरूरी सामग्री<br /></strong>खस की जड़ें: 50 ग्राम (यह किसी भी पंसारी या आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की दुकान पर आसानी से मिल जाती है)<br />चीनी: 2 कप<br />पानी: 4 कप (उबालने के लिए)<br />नींबू का रस: 1 से 2 चम्मच (इससे शरबत लंबे समय तक खराब नहीं होता)<br />हरा फूड कलर: 2-3 बूंदें (पूरी तरह से ऑप्शन – अगर आपको बिल्कुल बाजार जैसा हरा रंग चाहिए)<br />बर्फ के टुकड़े: सर्व करने के लिए</p>
<p><strong>खस का शरबत बनाने की आसान विधि<br /></strong>सबसे पहले खस की जड़ों को बहते पानी के नीचे अच्छी तरह धो लें ताकि उसकी सारी मिट्टी और धूल निकल जाए। इसके बाद, एक बर्तन में साफ पानी लें और खस की जड़ों को उसमें रात भर (या कम से कम 8-10 घंटे) के लिए भिगो कर रख दें।<br />अगले दिन सुबह, खस की जड़ों को उसी पानी के साथ एक भारी तले वाले बर्तन में गैस पर रखें। इसे मध्यम आंच पर 15 से 20 मिनट तक अच्छी तरह उबलने दें। ऐसा करने से खस की सारी ठंडक, खुशबू और अर्क उस पानी में आ जाएगा। इसके बाद गैस बंद कर दें और पानी को छानकर जड़ों को अलग कर लें।<br />अब एक दूसरे बर्तन में 2 कप चीनी और थोड़ा सा पानी डालकर गैस पर रखें। इसे तब तक पकाएं जब तक कि चीनी पूरी तरह से घुल न जाए और एक हल्की गाढ़ी चाशनी तैयार न हो जाए।<br />जब चाशनी तैयार हो जाए, तो उसमें छाना हुआ खस का पानी मिला दें। इसे 2-3 मिनट तक और पकने दें ताकि सब कुछ अच्छे से मिल जाए। गैस बंद करें और इसे पूरी तरह ठंडा होने दें।<br />मिश्रण ठंडा होने के बाद, इसमें एक या दो चम्मच नींबू का रस मिला दें। नींबू इसके स्वाद को तो बढ़ाएगा ही, साथ ही सिरप को जमने और खराब होने से भी रोकेगा। अगर आप बाजार जैसा लुक चाहते हैं, तो इसमें 2-3 बूंद हरा फूड कलर मिला सकते हैं।<br />आपका घर पर बना शुद्ध और गाढ़ा खस का सिरप बिल्कुल तैयार है। इसे एक साफ कांच की बोतल में भरकर फ्रिज में रख लें। यह महीनों तक खराब नहीं होता।<br />जब भी चिलचिलाती धूप से कोई घर आए या आपका कुछ ठंडा पीने का मन हो, तो एक गिलास में 2 से 3 चम्मच खस का सिरप डालें, ऊपर से बर्फ के कुछ टुकड़े और ठंडा पानी मिलाएं। चम्मच से अच्छी तरह घोलें और इस ठंडे-ठंडे शरबत का आनंद लें।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ये हैं बच्चे की कमजोर नजर के 5 शुरुआती संकेत</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160295/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 May 2026 12:31:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[बच्चों में विजन से जुड़ी परेशानियों का पता ना लगने का असर उनकी पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद पर भी पड़ सकता है। इसलिए, उन लक्षणों का समय रहते पहचान करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें चश्मा लगवाना काफी अहम है। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि किन बच्चों को नजर के चश्मे की जरूरत पड़ती &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="780" height="409" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/4-5.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/4-5.jpg 780w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/4-5-768x403.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px"></p>
<p>बच्चों में विजन से जुड़ी परेशानियों का पता ना लगने का असर उनकी पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद पर भी पड़ सकता है। इसलिए, उन लक्षणों का समय रहते पहचान करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें चश्मा लगवाना काफी अहम है। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि किन बच्चों को नजर के चश्मे की जरूरत पड़ती है और कैसे इसकी पहचान की जा सकती है।</p>
<p><strong>इन वजहों से बच्चे को लगाना पड़ता है चश्मा<br /></strong>आंखों की रोशनी में सुधार लाने के लिए<br />रोशनी कम हो जाने या लेजी आई की समस्या होने पर<br />आंखों की पॉजिशन को बेहतर बनाने के लिए जैसे क्रॉस्ड आई या तिरछापन<br />किसी एक आंख में रोशनी कम होने पर विजन सुरक्षित करने के लिए</p>
<p><strong>ऐसे जानें कि आपके बच्चे को चश्मा चाहिए<br /></strong>स्क्विंटिंग या भैंगापन: इसमें इमेज पर फोकस करने की क्षमता प्रभावित होती है। इससे बच्चा आंखों को तिरछा करके चीजों को देखने की कोशिश करता है।<br />करीब से टीवी या डिवाइस देखता है: अगर आपका बच्चा बहुत नजदीक से टेलीविजन या मोबाइल देखता है या फिर सिर को नीचे करके पढ़ता है तो यह उसके खराब होते विजन को दर्शाता है।<br />बार-बार आंखों को रगड़ना: कभी-कभार ऐसा होना ठीक है, लेकिन वह लगातार अपनी आंखों को रगड़ता है तो यह आई फटीग या स्ट्रेन की निशानी है। यह आंखों की कई अन्य समस्याओं की तरफ इशारा करता है। इसमें एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी शामिल है।<br />आंखों या सिर में दर्द की शिकायत: अगर दिनभर की पढ़ाई और काम के बाद बच्चा आंखों या सिर में दर्द की शिकायत करता है तो यह आंखों में धुंधलेपन की वजह से हो सकता है।<br />स्कूल के काम पर फोकस नहीं कर पाता: स्कूल में बच्चे को दूर और पास की चीजों को देखने के लिए जल्दी-जल्दी अपना विजुअल फोकस बदलना पड़ता है। आंखों में समस्या होने पर बच्चा स्कूल के काम में अपना पूरा ध्यान नहीं लगा पाता।</p>
<p><strong>क्या करें<br /></strong>बच्चों के डॉक्टर (पीडियाट्रिशियन) या स्कूल में आई टेस्ट के दौरान बच्चे की समस्या का पता नहीं लग पाता है तो फिर आंखों के डॉक्टर से जांच कराएं और इन बातों पर ध्यान दें:</p>
<p>आंखों का एक सीधाई में ना होना<br />आंखों की बाहरी और अंदरूनी सेहत<br />किसी गंभीर समस्या के लक्षण नजर आने पर</p>
<p><strong>ये भी जानें<br /></strong>बच्चों के विजन का विकास 1 से 7 साल की उम्र में भी होता रहता है। कई बार इस डेवलपमेंट में आने वाली परेशानियों को दूर करने और आंखों के सामान्य विकास में मदद के लिए भी ग्लास या चश्मा लगाने की सलाह दी जाती है।</p>
</div>
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		<item>
		<title>दिमाग से गंदगी बाहर निकालने के लिए जरूरी है चलना-फिरना</title>
		<link>https://ameerbharat.com/NewsArticle/160263/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 12:31:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://ameerbharat.com/NewsArticle/160263/</guid>

					<description><![CDATA[क्या आप जानते हैं कि आपका थोड़ा सा चलना-फिरना या शरीर को स्ट्रेच करना आपके दिमाग के लिए एक वैक्यूम क्लीनर की तरह काम कर सकता है?  हाल ही में अमेरिका की पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक बेहद दिलचस्प रिसर्च किया है, जो बताता है कि फिजिकल एक्टिविटी केवल शरीर के लिए ही &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="581" height="324" src="https://ameerbharat.com/wp-content/uploads/2026/05/1-2.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy"></p>
<p>क्या आप जानते हैं कि आपका थोड़ा सा चलना-फिरना या शरीर को स्ट्रेच करना आपके दिमाग के लिए एक वैक्यूम क्लीनर की तरह काम कर सकता है? </p>
<p>हाल ही में अमेरिका की पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक बेहद दिलचस्प रिसर्च किया है, जो बताता है कि फिजिकल एक्टिविटी केवल शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि दिमाग की अंदरूनी सफाई के लिए भी कितनी जरूरी है। आइए जानें इस बारे में। </p>
<h3 class="wp-block-heading">कैसे काम करता है यह दिमागी पंप?</h3>
<p>नेचर न्यूरोसाइंस जर्नल में पब्लिश इस रिसर्च के अनुसार, जब भी हम खड़े होते हैं या कदम बढ़ाते हैं, तो हमारे पेट की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं। यह सिकुड़न शरीर में एक नेचुरल पंप की तरह काम करती है।</p>
<p>यह पंप खून को स्पाइनल कार्ड की ओर धकेलता है, जिससे एक हल्का दबाव पैदा होता है। यह दबाव दिमाग के भीतर एक माइक्रो मूवमेंट पैदा करता है, जिससे आपके दिमाग की सफाई प्रक्रिया शुरू होती है।</p>
<p><strong>दिमाग का सुरक्षा कवच<br /></strong>दिमाग के चारों ओर सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड नाम का एक फ्लूइड होता है। इस फ्लूइड के तीन मुख्य काम होते हैं-</p>
<p>दिमाग तक जरूरी पोषण पहुंचाना।<br />दिमाग को बाहरी झटकों से बचाना।<br />दिमाग में जमा गंदगी और टॉक्सिन्स को बाहर निकालना।</p>
<p>जब हम शारीरिक रूप से एक्टिव होते हैं, तो पैदा होने वाला दबाव इस फ्लूइड के फ्लो को तेज कर देता है। वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया को ग्लिम्फैटिक सिस्टम का हिस्सा बताया है, जो असल में हमारे दिमाग की सफाई व्यवस्था है।</p>
<p><strong>गंदे स्पंज की तरह होती है सफाई<br /></strong>वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को समझने के लिए ‘गंदे स्पंज’ को निचोड़ने जैसा बताया। जिस तरह एक गंदे स्पंज को हाथ से दबाने पर उसमें जमा गंदा पानी बाहर निकल जाता है और वह साफ हो जाता है, ठीक उसी तरह जब शारीरिक गतिविधि से दिमाग में हलचल होती है, तो वहां जमा गंदगी बाहर निकल जाती है।</p>
<p><strong>चूहों पर हुई रिसर्च<br /></strong>चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा गया कि जैसे ही उनकी मांसपेशियां एक्टिव हुईं, उनके दिमाग में हलचल बढ़ गई और फ्लूइड का बहाव तेज हो गया। अक्सर हम सोचते हैं कि दिमाग को तेज करने के लिए सिर्फ पहेलियां सुलझाना या पढ़ना ही काफी है, लेकिन यह शोध साबित करता है कि फिजिकल एक्टिविटी दिमाग को तरोताजा रखने का नेचुरल तरीका है।</p>
</div>
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