ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। इसी तनावपूर्ण माहौल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपनी बीजिंग यात्रा पर निकल रहे हैं जहां वे राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मिलेंगे।
ट्रंप ने कई हफ्तों तक चीनी सरकार को यह समझाने की कोशिश की कि वह अपने व्यापक प्रभाव का इस्तेमाल करके ईरान को दो महीने से चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिकी शर्तों पर सहमत कराए या कम से कम महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोले। लेकिन, वह अब तक असफल रहे हैं।
एक तरफ वॉशिंगटन की नाराजगी है कि चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल ईरान को झुकाने के लिए नहीं कर रहा, तो दूसरी तरफ बीजिंग इसे ‘जंगल राज’ और एकतरफा दबाव की राजनीति बता रहा है।
इन गंभीर मतभेदों के बावजूद, दोनों महाशक्तियां इस कोशिश में जुटी हैं कि ईरान का मुद्दा उनके द्विपक्षीय संबंधों और व्यापारिक समझौतों को पूरी तरह पटरी से न उतार दे।
प्रतिबंधों का वार और कूटनीतिक दीवार
ट्रंप की यात्रा से ठीक पहले अमेरिका ने ईरानी सेना को संवेदनशील सैटेलाइट इमेज और तेल शोधन में मदद करने वाली चीनी कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगाकर इरादे साफ कर दिए हैं।
जवाब में बीजिंग ने अपने पुराने कानून को ढाल बनाकर इन प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया। जहां अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले, वहीं शी चिनफिंग ने ईरानी विदेश मंत्री की मेजबानी एवं तेहरान के परमाणु अधिकारों का समर्थन कर यह संदेश दिया है कि चीन अपनी शर्तों पर ही बात करेगा।
आर्थिक हितों की मजबूरी और नाजुक शांति सच्चाई यह है कि न तो ट्रंप फिर से ‘टैरिफ वार’ चाहते हैं और न ही शी चिनफिंग अपनी डगमगाती अर्थव्यवस्था पर नया बोझ।
दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आवाजाही रुकने से चीन को अमेरिका से कहीं अधिक नुकसान हो रहा है। ट्रंप का मानना है कि बंद बंदरगाह और महंगी ऊर्जा चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगी। फिर भी, बीजिंग किसी ऐसी राजनीतिक दलदल में नहीं फंसना चाहता जहां उसे अमेरिका का पक्ष लेते हुए देखा जाए।
माना जा रहा है कि यह शिखर सम्मेलन मतभेदों को सुलझाने से ज्यादा, उन्हें और गहरा होने से रोकने की एक कवायद है। दोनों नेता व्यापारिक स्थिरता और ‘सुपरपावर’ की गरिमा बनाए रखने के लिए ईरान के मुद्दे को एक सीमा तक ही खींचना चाहते हैं।


